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चुनावी मंझदार में डूबी बाबाओं की नैया

मार्केटिंग, ब्रांड की भाषा में इसे एक तरह से कंप्यूटर की विफलता माना जायेगा कि कंप्यूटर ब्रांड कामयाब नहीं रहा। मध्यप्रदेश में कंप्यूटर बाबा ने दिनदहाड़े, खुलेआम, सबके सामने घोषणा की थी कि जो भी हो, दिग्विजय सिंह जीत जायेंगे। दिग्विजय सिंह यूं तो धर्मनिरपेक्ष माने जाते हैं, पर अगर जीत की दिलासा मिले तो धर्मनिरपेक्ष क्या हो जाते हैं, यह सबने देखा। दिग्विजय सिंह ने बाकायदा पूजा- पाठ करवाया और ऐसा उनके कंप्यूटर बाबा के बयानों से आशय मिला कि बाबा तंत्र-मंत्र के जरिये ईवीएम सैट कर लेंगे और रिजल्ट दिग्विजय सिंह के पक्ष में जायेगा।
और सिर्फ कंप्यूटर बाबा ही नहीं, मिर्ची बाबा ने भी अपने तंत्र -मंत्र से दिग्विजय सिंह को जिताने का दावा किया था। कंप्यूटर भी फेल हुआ और मिर्ची भी। कंप्यूटर में मिर्ची भर गयी ऐसा माना जा सकता है, तब ही कंप्यूटर काम न कर पाया और मिर्ची भी रिजल्ट न दे पायी।
विचारणीय सवाल यह है कि कंप्यूटर बाबा जैसे किसी जीव को कर्नाटक में होना चाहिए था, जहां की राजधानी बेंगलुरू को देश की साफ्टवेयर राजधानी होने का सम्मान हासिल है। कंप्यूटरों पर कामकाज, कंप्यूटरों से टाप रोजगार बेंगलुरू में होता है, पर कंप्यूटर बाबा मध्यप्रदेश में होते हैं। कंप्यूटर की कलाकारी बेंगलुरू में दिख रही है, कंप्यूटर बाबा की कलाकारी भोपाल में दिख रही थी।
कंप्यूटर भी फेल, मिर्ची भी फेल। यानी नयी तकनीकी अर्थव्यवस्था भी फेल और पुरानी कृषि अर्थव्यवस्था भी फेल, यह हो क्या रहा है। दिग्विजय सिंह के काम कुछ भी न आया।
पर कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा का एक काम तो हो गया, नाम भरपूर हो गया।
जितनी ब्रांडिंग कंप्यूटर बाबा और मिर्ची बाबा की फ्लाप होकर हो गयी, उतनी ब्रांडिंग के लिए कई उत्पाद लाखों-करोड़ों खर्च करते हैं। कंप्यूटर औऱ मिर्ची बाबा के पराक्रम ने साफ किया कि सिर्फ बाबा होना काफी नहीं है। कंप्यूटर या मिर्ची बाबा होना जरूरी है। अलग पहचान बनती है। बाबाओं में ब्रांडिंग का चलन अभी बहुत शुरू न हुआ है। पर बाबाओं को ब्रांडिंग पर ध्यान देना चाहिए। ब्रांडेड बाबा ज्यादा फीस वसूल सकते हैं, ज्यादा फीस वसूल पायेंगे तो बाबागिरी में ज्यादा समझदार लोग आयेंगे। कंप्यूटर बाबा या मिर्ची बाबा ज्यादा समझदार होते तो इतना खुलकर न बोलते, अगर-मगर के साथ बोलते, जैसे नेता बोलते हैं। कंप्यूटर बाबा या मिर्ची बाबा पके हुए राजनीतिक विश्लेषक की तरह यह भी बोल सकते थे-हवा तो प्रचंड दिग्विजय सिंह के पक्ष में बहती दिख रही है। पर लोकतंत्र में असली देवता मतदाता ही होता है। इस बयान की आड़ लेकर बाबा लोग बाद में बच सकते थे।
अब मिर्ची बाबा सुना है, बचते हुए घूम रहे हैं। नेता कुछ भी कहने के बाद बच निकलता है, बाबा को बच निकलने में दिक्कतें पेश आती हैं।
यानी नेता बाबाओं का भी परम बाबा होता है, घुटा हुआ बाबा होता है। बाबाओं, पहले नेताओं के चेले बनो।

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