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मोहरी बाजा के बिना बस्तर में नहीं होते कोई शुभ काम

जगदलपुर, 25 मई। बस्तर के परंपरागत वाद्य यंत्रों में मोहरी बाजा का अपना विशेष स्थान है। कोई भी शुभ काम मोहरी बाजा के बिना पूरा नहीं होता है। मोहरी और नगाड़े की मस्त धुनों का अद्भुत संगम ही मोहरी बाजा है। मोहरी एक तरह से शहनाई का ही प्रकार है। बांस की खोखली नली में बांसुरी की तरह ही सात छिद्र होते हैं।

मोहरी बाजा के बिना बस्तर में नहीं होते कोई शुभ काम सामने पीतल का बना गोलाकार मुख लगा होता है। इस पर देवी-देवताओं को समर्पित पवित्र चिन्हों जैसे पदचिन्ह, सूर्य, चान्द, नाग का अंकन रहता है। मोहरी के पीछे ताड़ पत्रों से बनी टुकनी लगी होती है। मोहरी बजाना भी कोई आसान काम नहीं है।

मोहरी बाजा के बिना बस्तर में नहीं होते कोई शुभ काम इसके लिये लम्बी और गहरी स्वाशों की जरूरत पड़ती है। फेफड़ों का मजबूत होना बेहद जरुरी है। मोहरी बाजा बजाने वाले माहरा जाति से होते हैं। पूजापाठ, शादी ब्याह में मोहरी बाजा बजाने का काम माहरा जाति के ही लोग करते हैं, ये इनका पैतृक और सदियों पुराना काम है।

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