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रील लाइफ की रियल सुपर मॉम

एक वक्त था जब मां के बगैर फिल्मों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज भी कई हिंदी फिल्में इसलिए याद की जाती हैं क्योंकि उनमें मां के किरदार बहुत सशक्त थे। लेकिन धीरे-धीरे सिनेमा में मां का महत्व घटने लगा और फिल्मों में मां के सशक्त किरदार दिखने कम हो गए। मौजूदा समय में तस्वीर फिर बदली है, अब मां के किरदार फिल्मों में फिर अहम हो गए हैं। एक नजर, फिल्मी पर्दे पर मां के किरदारों और उनके महत्व पर।

आज मेरे पास बिल्डिंगें हैं, प्रॉपर्टी है, बैंक-बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, क्या है तुम्हारे पास…?’

‘मेरे पास मां है…!’

चार दशक पहले फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन के गुरूर से भरे संवाद के बाद छाई दो पल की चुप्पी के बाद आने वाला शशि कपूर का यह संवाद हिंदी फिल्मों का सबसे अहम संवाद है, जिसे दर्शक दशकों से सुनते और दोहराते आए हैं। देखा जाए तो महज चार शब्दों का यह संवाद अपने-आप में एक पूरी कहानी बयान करता है, उस परंपरा को बताता है कि किस तरह से मां हमारे लिए सबसे खास है। दुनिया की कोई चीज, कोई संपन्नता हमारे लिए मां से बढ़ कर नहीं हो सकती।

फिल्मी पर्दे पर मां का सफर

मां हमारी फिल्मों का एक ऐसा किरदार रहा है, जिसके बिना कहानी में ट्विस्ट ही नहीं आता। पहले की फिल्मों में देखिए तो अकसर हीरो-हीरोइन की लव-स्टोरी में पिता की सहमति नहीं होती थी, लेकिन मां अपने बच्चों का साथ जरूर देती थी। फिल्मों में हर बेटा अपनी मां के लिए जान पर खेल जाता था, वहीं मां भी अपने बच्चों के लिए सब कुछ लुटाने को तैयार रहती थी।

न जाने कितनी ही फिल्में, कितने ही सीन और कितने ही संवाद हैं, जो पर्दे पर मां के किरदार की वजह से ही यादगार बन गए। लेकिन फिल्मों में मां के चित्रण और सफर में कई बदलाव भी आए। नब्बे के दशक की शुरुआत में जब सलमान, आमिर और शाहरुख खान जैसे नई पीढ़ी के युवा नायक उभर कर आए तो इनकी मांओं के चेहरे भी बदले।

‘मैंने प्यार किया’ से रीमा लागू के रूप में फिल्मी मां का एक नया चेहरा सामने आया, जो पहले की निरूपा राय, ललिता पवार, अचला सचदेव, दुर्गा खोटे, लीला मिश्रा, सुलोचना, लीला चिटनिस, दुलारी जैसी मांओं से एकदम जुदा था। रीमा के साथ हिमानी शिवपुरी, फरीदा जलाल, स्मिता जयकर, सुहासिनी मुले जैसी एक्ट्रेस ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

अभी भी इनके निभाए किरदारों को याद किया जाता है। यह मां पहले की फिल्मी मांओं से काफी जुदा थीं। वरिष्ठ फिल्म और कला समीक्षक विनोद भारद्वाज का मानना है कि बदलते सामाजिक परिवेश के चलते ऐसा होना स्वाभाविक है।

वह कहते हैं, ‘फिल्मों में मां तो अब भी है लेकिन वो निरूपा राय नहीं है और न ही ललिता पंवार। उस तरह के जो तत्व होते थे, वे गायब हो गए हैं। रीमा लागू के आने के बाद से ऐसी मांएं आने लगीं, जो थोड़ी यंग हैं और मुझे लगता है कि यह ठीक भी है। जैसे-जैसे समाज में चीजें बदलेंगी तो उसका असर फिल्मों में दिखेगा ही।’

अब बहुत बदल गई है छवि

इधर कुछ समय से फिल्मों में मां के किरदार न सिर्फ पहले से ज्यादा नजर आने लगे हैं बल्कि अब ये शो-पीस भी नहीं रहे हैं। फिल्मी पंडितों का मानना है कि हाल के समय में पारिवारिक फिल्मों की बढ़ती तादाद ने पर्दे पर मां की वापसी की राह आसान की है। इसी साल यानी 2019 में ही देखें तो ‘लुका छुपी’ और ‘रॉबिन अकबर वॉल्टर’ में मां के किरदारों को काफी जगह मिली।

संयोग से इन दोनों ही फिल्मों में अलका अमीन ही मां की भूमिकाओं में दिखी हैं। फिर 2018 का साल तो मां के पर्दे पर आने और छा जाने का रहा। सुखद बात तो यह भी है कि 2018 की फिल्मों को बंटने वाले ज्यादातर पुरस्कारों में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के अवार्ड के लिए ‘अक्टूबर’ में नायिका की मां बनीं गीतांजलि राव और ‘सुई धागा’ में नायक की मां बनीं यामिनी दास नजर आईं।

यामिनी दास कहती हैं, ‘अब फिल्मकार यह समझने लगे हैं कि अगर दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक जगह बनानी है तो उन्हें वैसी फिल्में देनी होंगी, जो वे परिवार के साथ बैठकर देख सकें, अगर आप फिल्म में किसी परिवार को दिखाएंगे तो वह मां के बिना अधूरा दिखेगा।’

आमिर खान वाली चर्चित, सफल फिल्म ‘तारे जमीं पर’ में डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे ईशान अवस्थी की मां का किरदार निभाने वालीं एक्ट्रेस टिस्का चोपड़ा कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि एक एक्ट्रेस के लिए फिल्मी पर्दे पर निभाए जाने वाले किसी भी किरदार से ज्यादा मुश्किल, प्रभावी और संतुष्टिदायक मां का किरदार होता है।’

फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में मां का किरदार निभाने वालीं अदाकारा अंजलि पाटिल का कहना है, ‘एक मां में पूरा संसार समाया होता है। उसके बिना न तो वास्तविक जीवन में हमारा कोई अस्तित्व होता है और न ही फिल्मों में।’

‘विकी डोनर’ में मां का किरदार निभा कर राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वालीं अदाकारा डॉली अहलूवालिया का कहना है, ‘मां से सिनेमा है, सिनेमा से मां नहीं है। जब तक सिनेमा रहेगा, मां को पर्दे पर आना पड़ेगा। अलग-अलग किस्म की फिल्मों में मां के किरदार की लंबाई छोटी-बड़ी हो सकती है लेकिन आप गौर कीजिए तो मां के चित्रण के बिना बनने वाली फिल्मों में और भले ही कुछ होता हो, आत्मा नहीं होती।’

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