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कविता, शायरी, कोटेशन मनोरंजन

छत्तीसगढ़ के कवि की अनुपम कविता “मेरा अस्तित्व”

जब भी खुद को अकेले पाया
खुद से ही नजरें मिलाया
अलग थी मैं दुनिया की भीड़ से
बेबाक से था मेरा साया
सिले हुए ये होंठ मेरे
अब लगे थे मुस्कुराने
नयन कमल खिल रहे थे
भौंरे लगे थे गुनगुनाने
अश्क़ बन मोती अब
गिर लगे थे चमकने
शब्द सुरभित हो उठे थे
अधरों पर थे लगे महकने
कुंठित हृदय भी अब
हो प्रफुल्लित झूम रहा
जैसे स्वयं की तलाश में
दिवा-रात्रि घूम रहा
भाव बन स्वर्णिम हार
स्वयं से स्वयं ही मिल रहे
रहस्यमयी हुए नेत्र
अधर मेरे सिल रहे
बन शब्दों के मोती
अधरों से थे झर रहे
मुख मंडल हो दीप्तिमान
नूतन उमंग हैं भर रहे

रचना – मधुमिता घोष”प्रिणा”

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